हरियाणा कला परिषद एवं संस्कार भारती के तत्वावधान आयोजित किया जा रहा उसके आठवें दिन बाल भवन में दो नाटक अंधेर नगरी और नाटक आओ मन की गाँठें खोलें का मंचन हुआ । अगर मैं कवि ना होता तो परमाणु परीक्षण हिरोशिमा और नागासाकी की तरह करवा सकता था । ऐसे संवाद से शुरू हुआ नाटक मन को झिंझोड़ गया ।
राखी दूबे के निर्देशन में हुए इस नाटक में अटल जी के जीवन से जुड़ी घटनायें दिखाई गई । नाटक में बताया गया कि वाजपेयी जी की पहली कविता थी ताजमहल । ताजमहल को सुंदर बताने के साथ साथ अटल जी ने अपनी कविता में बताया कि ताजमहल बेहद खूबसूरत है लेकिन मज़दूरों के हाथ काट देना ताजमहल
के पीछे बड़ी दुखद घटना है । अटल एक संवाद में कहते हैं कि कविता शौक़ नहीं ज़िम्मेदारी है ।
अटल जी के चर्चित भाषणों को भी इस नाटक
में दिखाया गया । अटल जी के रूप
में नवनीत शर्मा , रमन दीप और दिनेश सेनी ने सधा हुआ अभिनय किया । संस्था के अध्यक्ष मनोज बंसल ने बताया कि रंग आँगन उत्सव हिसार की लोगों को बहुत अच्छा लग रहा है और अगले वर्ष इसे और बड़ा किया जाएगा ।
इस नृत्य नायिका में अटल जी की कविता कदम मिलाकर चलना होगा , ताजमहल , चोर सिपाही , ठन गई , गीत नया गाता हूँ का प्रयोग हुआ है ।
इस प्रस्तुति का वस्त्र विन्यास स्नेहा बिशनोई ने किया, सह निर्देशन रमनदीप ने किया। इसमें लगभग 30 कलाकारों ने काम किया । प्रस्तुति में अटल बिहारी बाजपेयी के जन्म से लेकर अंतिम समय तक का ज़िक्र किया गया ।
नाटक में दिखाया गया कि अटल जी पद पर रहते हुए जी
भी कविता के माध्यम से व्यवस्था पर चोट करते थे । नाटक में दिखाया गया कि विपक्षी दल भी अटल
के भाषणों और कविताओं का कितना बड़ा प्रशंसक था ।
नाटक अंधेर नगरी के पहले दृश्य में महंत अपने दो चेलों के साथ दिखाई पड़ते हैं जो अपने शिष्यों गोवर्धन दास और नारायण दास को पास के शहर में भिक्षा माँगने भेजते हैं। वे गोवर्धन दास को लोभ के बुरे परिणाम के प्रति सचेत करते हैं और दिखाते है कि लालच कैसा होता है | दूसरे दृश्य में शहर के बाजार का दृश्य है जहाँ सबकुछ टके सेर बिक रहा है। गोवर्धन दास बाजार की यह कफैयत देखकर आनन्दित होता है और सात पैसे में ढाई सेर मिठाई लेकर अपने गुरु के पास लौट जाता है। तीसरे दृश्य में महंत के पास दोनों शिष्य लौटते हैं। नारायण दास कुछ नहीं लाता है जबकि गोबर्धन दास ढाई सेर मिठाई लेकर आता है। महंत शहर में गुणी और अवगुणी को एक ही भाव मिलने की खबर सुनकर सचेत हो जाते हैं और अपने शिष्यों को तुरंत ही शहर छोड़ने को कहते हैं। वे कहते हैं- “सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास। ऐसे देश कुदेस में, कबहूँ न कीजै बास।।” नारायण दास उनकी बात मान लेता है जबकि गोवर्धन दास सस्ते स्वादिष्ट भोजन के लालच में वहीं रह जाने का फैसला करता है। चौथे दृश्य में अँधेर नगरी के चौपट राजा के दरबार और न्याय का चित्रण है। शराब में डूबा राजा फरियादी के बकरी दबने की शिकायत पर बनिया से शुरु होकर कारीगर, चूनेवाले, भिश्ती, कसाई और गड़रिया से होते हुए कोतवाल तक जा पहुँचता है और उसे फाँसी की सजा सुना देता है। पाँचवें दृश्य में मिठाई खाते और प्रसन्न होते मोटे हो गए गोवर्धन दास को चार सिपाही पकड़कर फांसी देने के लिए ले जाते हैं। वे उसे बताते हैं कि बकरी मरी इसलिए न्याय की खातिर किसी को तो फाँसी पर जरूर चढ़ाया जाना चाहिए। जब दुबले कोतवाल के गले से फाँसी का फँदा बड़ा निकला तो राजा ने किसी मोटे को फाँसी देने का हुक्म दे दिया। छठे दृश्य में शमशान में गोवर्धन दास को फाँसी देने की तैयारी पूरी हो गई है। तभी उसके गुरु महंत जी आकर उसके कान में कुछ मंत्र देते हैं। इसके बाद गुरु शिष्य दोनों फाँसी पर चढ़ने की उतावली दिखाते हैं। राजा यह सुनकर कि इस शुभ सइयत में फाँसी चढ़ने वाला सीधा बैकुंठ जाएगा स्वयं को ही फाँसी पर चढ़ाने की आज्ञा देता है। इस तरह अन्यायी और मूर्ख राजा स्वतः ही नष्ट हो जाता है। इसके बाद उत्सव रियाज़ स्टूडियो में दो दिन किया जाएगा ।

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