*जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की 100 वीं जयंती(जन्मशताब्दी )पर विशेष :- योगेंद्र योगीअधिकार चाहो तो लड़ना सीखो पग पग पर अढना सीखो जीना है तो मरना सीखो” :-जननायक कर्पूरी ठाकुर (पूर्व मुख्यमंत्री विहार)

*जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की 100 वीं जयंती(जन्मशताब्दी )पर विशेष :- योगेंद्र योगीअधिकार चाहो तो लड़ना सीखो पग पग पर अढना सीखो जीना है तो मरना सीखो” :-जननायक कर्पूरी ठाकुर (पूर्व मुख्यमंत्री विहार)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, महान कर्मयोगी,पिछडे,शोषित एवम दलित बंचितों के मसीहा , शिक्षक, राजनीतिज्ञ , प्रखर समाजवादी , बिहार राज्य के दूसरे उप मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर जी का जन्म अंग्रेजी शासन काल में 24 जनवरी सन 1924 को विहार राज्य के जिला समस्तीपुर के पितौंझिया गांव (अब कर्पूरी ग्राम) में एक गरीब नाई के घर में हुआ था।
जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के पिताजी का नाम श्री गोकुल ठाकुर तथा माता जी का नाम श्रीमती रामदुलारी देवी था। इनके पिता गांव के सीमांत किसान थे तथा अपने पारंपरिक पेशा नाई का काम करते थे।
भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उन्होंने 26 महीने जेल में बिताए थे। वह 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 तथा 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान दो बार बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे।
उनकी सादगी के किस्से जानकर आज भी लोगों की आंखों में आंसू आ जाते हैं. ऐसा समाजवाद अब कहां? बड़े-बड़े राजनेता उनकी दयनीय स्थिति के बारे में जानकर रो पड़ते थे. आज कर्पूरी ठाकुर की 100वीं (जन्मशताब्दी)जयंती है. उनके पूरे व्य​क्तित्व और कृतित्व को कुछ सौ शब्दों में समेटना मुमकिन तो नहीं, लेकिन उनकी सादगी से जुड़े कुछेक स्मरण (किस्से) जरूर सुना सकते हैं।
दोस्त का फटा कोट पहनकर गए विदेश :-
जब 1952 में कर्पूरी ठाकुर जी पहली बार विधायक बने, उन्हीं दिनों ऑस्ट्रिया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में उनका चयन हुआ था. लेकिन उनके पास पहनने को कोट नहीं था.
दोस्त से कोट मांगा तो वह भी फटा हुआ ​मिला. कर्पूरी जी वही कोट पहनकर वहां चले गए. वहां यूगोस्लाविया के प्रमुख मार्शल टीटो ने जब उन्हें फटा कोट पहने हुए देखा तो उन्होंने उन्हें नया ​कोट गिफ्ट किया।
आज तो आदमी की पहचान ही उसके कपड़ों से की जाने लगी है।

बेटे के इलाज के लिए ठुकरा दी इंदिरा गांधी की पेशकश :-
साल 1974 मे कर्पूरी ठाकुर जी के छोटे बेटे का मेडिकल की पढ़ाई के लिए चयन हुआ. पर वे बीमार पड़ गए. दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती हुए. हार्ट की सर्जरी होनी थी. इंदिरा गांधी को मालूम हुआ तो एक राज्यसभा सांसद को भेजकर एम्स में भर्ती कराया. खुद मिलने भी गईं और सरकारी खर्च पर इलाज के लिए अमेरिका भेजने की पेशकश की.
कर्पूरी ठाकुर को मालूम हुआ तो बोले, “मर जाएंगे, लेकिन बेटे का इलाज सरकारी खर्च पर नहीं कराएंगे.” बाद में जयप्रकाश नारायण ने कुछ व्यवस्था कर न्यूजीलैंड भेजकर उनके बेटे का इलाज कराया था।

फटा कुर्ता देख चंद्रशेखर ने किया चंदा, लेकिन…
वर्ष 1977 मे पटना के कदम कुआं स्थित चरखा समिति भवन में जयप्रकाश नारायण जी का जन्मदिन मनाया जा रहा था. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी , नानाजी देशमुख समेत देशभर से नेता जुटे थे. मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर जी फटा कुर्ता, टूटी चप्पल के साथ वहां पहुंचे. तभी एक नेता ने टिप्पणी की, ‘किसी मुख्यमंत्री के ठीक ढंग से गुजारे के लिए कितना वेतन मिलना चाहिए?’
इस पर सब हंसने लगे. चंद्रशेखर जी अपनी सीट से उठे और अपने कुर्ते को सामने की ओर फैला कर कहने लगे, कर्पूरी जी के कुर्ता फंड में दान कीजिए. सैकड़ों रुपये जमा हुए. जब कर्पूरी जी को रूपये थमाकर कहा कि इससे अपना कुर्ता-धोती ही खरीदिएगा तो कर्पूरी जी ने कहा, “इसे मैं मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा दूंगा.”

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