डॉ कमलेश कली
हम अपना बहुत सारा समय और ऊर्जा दूसरों के बारे में जानने, समझने और उन्हें अपने हिसाब से चलाने में गुजार देते है ,पर हम अपने मन को तो देखते ही नहीं, उसके बारे में कुछ जानते ही नहीं। इस दुनिया में अगर कोई सबसे रुचिकर और अच्छा काम है तो शायद अपने मन को देखना और उसे समझना है, उसमें उठ रहे संकल्पों, विचारों को पढ़ना, मन की वृतियों और भावनाओं से अवगत होना और उन्हें सही दिशा देना।यह इतना आसान भी नहीं है पर मुझे तो यह काम सबसे अच्छा लगता है जब हम अपने मन की अठखेलियों और उसकी उलट कलाबाजियों को तटस्थ हो कर देखते हैं, कितना बिगड़ैल है यह मन! वर्तमान में तो टिकता ही नहीं,या तो बीती बातों को याद करता रहेगा या फिर आने वाले कल की चिंता में डूबा होगा। ज़रा कुछ अच्छा सोचने के लिए खुराक़ इसे दो तो सही उसी समय संदेह, अविश्वास और प्रश्नों की झड़ी ही लगा देता है। ज़रा सफेद पक्ष देखा नहीं कि उसका स्याह पक्ष खोज लाता है और सामने लहरा देता है! कहने का मतलब यह है कि सारी उलझनें और दुविधा मन ही तो पैदा करता है,मन के ही तो बनाएं सारे बंधन है, तभी तो कहते हैं कि भगवान की बनाई सारी सृष्टि तो सही है, हमारी दृष्टि में ही फर्क है, हमारा मन हमें जैसा दिखाता है हम वैसे ही देखते हैं, जिंदगी के रास्ते तो सीधे सपाट है,पर मोड़ तो सारे मन के है। मन हमें अपने मायाजाल में फंसा कर ही रखता है और हम अपने बनाए जाल में फंसते ही चले जाते हैं। एक स्विस लोक कथा है,एक बार एक व्यक्ति कही बाहर जा रहा था, उसने दूध का भरा लोटा अपने पड़ोसी के पास रख दिया और कहा कि शाम जब वह वापस आएगा तो ले लेगा। जब वह वापस पहुंचा और अपने पड़ोसी से अपना लोटा मांगा तो उसने उसको खाली लोटा पकड़ा दिया। उसने कहा कि वह लोटा तो दूध से भरा हुआ था,दूध कहां गया? उसका पड़ोसी बोला , सारा दूध तो मक्खियां पी गई। उस व्यक्ति ने कहा कि ऐसे कैसे हो सकता है? दोनों आपस में लड़ने लगे, तर्क वितर्क करने लगे, लड़ते लड़ते वहां जज के पास पहुंचे। जज ने उनकी बात सुनी और पड़ोसी से पूछा कि क्या उस व्यक्ति ने आपको दूध से भरा लोटा दिया था,वह कहने लगा बिल्कुल दिया था। फिर जज ने पूछा कि दूध कहां गया? पड़ोसी बोला कि दूध तो मक्खियां पी गई।जज ने उसे कहा कि आपने मक्खियों को हटाया क्यों नहीं? पड़ोसी बोला कि अगर आप इजाजत दे तो अभी हटा देता हूं। जज ने कहा, इजाजत है। उस पड़ोसी ने जज के मुंह पर कस के थप्पड़ मार दिया, उसने यह सब वहां बैठी मक्खी को हटाने के लिए किया।जज बेचारा फंस गया क्योंकि उसने स्वयं ही उसे कहा था कि मक्खियां हटाने की इजाजत है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम अपने लिए खुद ही ऐसी स्थिति बना लेते हैं और फिर उसमें फंस जाते हैं।
Leave a Reply