जीवन के संघर्ष पथ पर जो मिले  यह भी सही और वह भी सही!

डॉ कमलेश कली 

हम अपना जीवन विरोधाभासों में बिता देते हैं, कुछ सही चीजें कभी हमें गलत लगती है तो कुछ गलत चीजें हमें सही प्रतीत होती है। ऐसे में स्वाभाविक है मन में सवाल उठता है कि सही और ग़लत को लेकर क्या हमारी समझ सही है? जीवन में हम भौतिक सुख सुविधाओं की तरफ भागते हैं,यह जानते हुए भी कि ये क्षणभंगुर है और अन्ततः इनसे दुःख ही मिलने वाला है, और एक दिन सब कुछ खत्म हो जाने वाला है। जीवन ऐसी ही विसंगतियों से भरा हुआ है। जीवन के रहस्यों को समझना कोई आसान नहीं है,पर कोई चारा भी तो नहीं है। जीवन कोई फूलों की सेज नहीं है अपितु कांटों भरा ताज है। प्रसिद्ध कानून संविधान विशेषज्ञ स्वर्गीय नानी पालकीवाला कहा करते थे,” यदि चाहते हो कि जीवन फूलों से भरा हुआ हो, तो सोने के लिए सेज नहीं मिलेगी और अगर सेज पर सोने के इच्छुक हो तो  फूलों को भूल जाओ।” मतलब हर पल चुनाव करना है और परस्पर विरोधी तत्वों का सामना करना हैं। कर्म करो पर फल की इच्छा न करो,रहो इस दुनिया में पर फंसो नहीं। मतलब विरोधाभासों से ऊपर उठना होता है। एक बार एक जिज्ञासु झेन मास्टर के पास जाता है और अपने कुछ सवाल रखता है और पूछता है कि बुद्धत्व को उपलब्ध कैसे किया जा सकता है, झेन बनने में कितना समय लगता है। उसका गुरु उसे कोई उत्तर नहीं देता।वह उनसे कहता है कि अगर वह निरंतर,गंभीर होकर प्रयास करें तो क्या वह पांच वर्षों में झेन को उपलब्ध हो जाएगा।झेन मास्टर कहता है कि नहीं ऐसे में तो उसे दस वर्ष लगेंगे।वह कहता है कि वह  ईमानदारी से, सच्चे मन से और अधिक परिश्रम करें तो उसे कितने वर्षों में झेन जैसी समझ आ जाएगी,उसका गुरु कहता है तब तो उसे बीस वर्ष लग जाएंगे। जिज्ञासु असमंजस में पड़ जाता है कि अजीब गुरु है, मैं जितना ज्यादा परिश्रम करने की बात कहता हूं,ये  महानुभाव उतना ही समय बढ़ाते जाते हैं! उसके सवाल को भांपते हुए गुरु उस जिज्ञासु से कहते हैं कि “जो चीज़ सहज उपलब्ध है, उसके लिए प्रयास करके हम उसे अपने से दूर कर लेते हैं । हमारे पास उसे पाने के लिए केवल एक आंख ही बचती है, क्योंकि एक आंख तो अपने श्रम और प्रयासों को बढ़ाने पर लगी होती है ।”  समझ में आया कुछ ,आ गया तो बहुत अच्छा, नहीं आया तो और भी अच्छा, क्योंकि जीवन एक ऐसी पहेली हैं, इसे जितना सुलझाने की कोशिश करते हैं और भी उलझती जाती है।

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