स्वतंत्रता सेनानी साधुराम की जयंती पर पौधे वितरित करेगी जम्भ शक्ति संस्था क्रांतिकारियों के लिए बम बनाते थे स्वतंत्रता सेनानी साधुराम, हिसार के न्यू जवाहर नगर में आज भी गुमनामी की जिन्दगी जी रहा है उनका परिवार

स्वतंत्रता सेनानी साधुराम की जयंती पर पौधे वितरित करेगी जम्भ शक्ति संस्था क्रांतिकारियों के लिए बम बनाते थे स्वतंत्रता सेनानी साधुराम, हिसार के न्यू जवाहर नगर में आज भी गुमनामी की जिन्दगी जी रहा है उनका परिवार

पाठकपक्ष न्यूज
हिसार,लंबे समय बीड़ हिसार में रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी साधुराम की 1 जनवरी 2024 को आने वाली जयंती पर सामाजिक संस्था जम्भ शक्ति शहर के अलग-अलग स्थानों पर 51 पौधे वितरित करेगी। साथ ही आमजन को उनकी जीवनी से रुबरु करवाया जाएगा। इस दौरान आमजन को बताया जाएगा कि किस प्रकार स्वतंत्रता सेनानी का परिवार किस प्रकार हिसार के न्यू जवाहर नगर में आज भी गुमनामी की जिन्दगी जी रहा है। यह जानकारी देते हुए संस्था के अध्यक्ष विकास गोदारा ने बताया कि जालंधर जिले के काहमा गांव में गेंदा राम के घर में 1 जनवरी 1925 को जन्में स्वतंत्रता सेनानी साधुराम बचपन से देश को आजाद करवाने के सपने देखते थे। अमर शहीद भगत सिंह, दुर्गा भाभी व आजाद सिंह जैसे क्रांतिकारियों को अपना आदर्श मानने वाले स्वतंत्रता सेनानी साधुराम ने महज 14 वर्ष की आयु में ही अपनी पढ़ाई छोड़ कर क्रांतिकारियों के लिए बम बनाना सीख लिया था। देश को आजाद कराने की उनके मन में धुन इस कदर सवार थी कि उन्होंने महज आठवीं कक्षा में ही अपनी पढ़ाई अधर में छोड़ दी थी। महान स्वतन्त्रता बटुकेश्वर दत्त की अगुवाई में उन्होंने सबसे कम उम्र के सदस्य के तौर पर उनकी बम बनाने की टीम शामिल हुए थे। वर्ष 1941 में बम बनाते समय एक बम साधुराम के हाथ में ही फट गया था। जिसमें उनका एक हाथ पूर्णरुप से क्षतिग्रस्त हो गया था। जिसके चलते उन्हें मजबूरन बम बनाने के दस्ते से दूरी बनानी पड़ी। मगर उन्होंने अपनी
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आजादी की लड़ाई जारी रखी। उसके बाद वो सत्याग्रह आंदोलन व भारत छोड़ो आंदोलनों का हिस्सा बने रहे। इसी कड़ी में 10 फरवरी 1941 को सरकार विरोधी भाषण देने की सजा के तौर पर उन्हें गिरफ्तार किया और 1 साल तक जेल में रखा गया। इसी प्रकार वर्ष 1942 में 5 जून और 15 अगस्त को फिर से गिरफ्तार किया। इस दौरान वो स्वतंत्रता सेनानी लाला बलवंत राय तायल व अन्य अग्रिम पक्ति के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ वो सेंट्रल जेल लाहौर व मुल्तान सहित देश की अलग-अलग जेलों में करीब छह वर्ष तक बंद रहे। आजादी के बाद उन्हें दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह उन्हें हरियाणा में बीड़ हिसार में उनकों भी जमीन अलॉट की गई व उन्हें तीन ताम्र पत्रों व कई अवार्डों से नवाजा गया। वो 4 नवंबर 1987 को इस संसार से हमेशा के लिए विदा ले गए । विकास गोदारा के अनुसार उन्हें वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। बड़ी बात यह है कि उनका परिवार आज भी हिसार के न्यू जवाहर नगर में आज भी गुमनामी की जिन्दगी जी रहा है।

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