हम हर पल कुछ न कुछ सोचते रहते हैं, मतलब अंदर विचारों का प्रवाह चलता रहता है। हम उन पर गौर करें तो पाएंगे कि उनमें से ज्यादातर तो व्यर्थ के विचार होते हैं, मतलब उनका कोई सिर पैर नहीं होता और ज्यादा तर उनमें दोहराव होता है, अंदर में एक ही ट्यून बार बार बजती रहती है। अगर हम और ज्यादा बारीकी से देखें तो ये विचार कहीं न कहीं हमारे अंदर की भावनाओं से जुड़े होते हैं, यानी इमोशन्स उन्हें हवा दे रही होती हैं। नेगेटिव भावनाएं जैसे कि ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, घृणा हमारे पर हावी होती है तो उससे नकारात्मक और व्यर्थ के संकल्प विकल्प अंदर उत्पन्न होते हैं और हमारा मन इन के चक्रव्यूह में ऐसा फंसता है और उनमें ऐसे जकड़ा हुआ महसूस करता है मानो बाहर से कोई फोर्स उसे विवश कर रही हो, जबकि साक्षी दृष्टा हो कर देखें तो सब कुछ अंदर में हम ही तो रच रहे होते हैं, हमारे संस्कार और भावनाएं ही तो भीतर काम कर रहे होते हैं इनके प्रति सजग होना ही तो अंतर्मुखी होना है और इससे ही हम अपने भीतर अपने ऊपर काम कर सकते हैं। अंदर अगर स्वार्थ, लोभ, लालच और अहंकार भरा है तो चाहे हम शुभ कर्म करें, पुण्य के काम करे पर उनका परिणाम शुभकारी और मंगलकारी हो ही नहीं सकता। एक बार यमदूत एक स्त्री को मरने के बाद उसके अन्तवाहक शरीर को लेकर आते हैं और चित्रगुप्त कहते हैं कि इस औरत के पूर्व कर्म बिलकुल अच्छे नहीं थे, इसने जीवन भर कोई पुण्य का काम नहीं किया था, इसलिए इसे नरक में ले जाओ। वह औरत चिल्लाने लगती है कि ऐसे कैसे हो सकता है, फिर वो याद करके बताती है कि उसने एक बार भूखे एक भिखारी को मूली दान में दी थी। चित्रगुप्त सारे खाते उलट पलट कर देखते हैं तो सच में ही उस स्त्री ने भूखे भिखारी को मूली खिलाई थी। इस पुण्य कर्म के बदले उसे थोड़ी देर के लिए स्वर्ग ले जाने का आदेश देते हैं। उसी समय एक मूली प्रकट होती है जिसे पकड़ कर उसे स्वर्ग जाना होता है। जैसे ही वह मूली को पकड़ कर ऊपर की तरफ उडऩे लगती है तो उसकी टांगों को पकड़ दूसरे नरक वासी भी उसके पीछे पीछे उडऩे लगते हैं। वह पीछे मुड़कर देखती है तो हैरान हो जाती है उसके पीछे कई और भी, एक के पीछे एक, पकड़े हुए उसके साथ स्वर्ग में आ रहे थे। अब उसके अंदर ख्याल आता है कि मूली तो उसने दान दी थी, ये सब लोग उसको पकड़ क्यों स्वर्ग में जा रहे हैं? सब को मेरे पुण्य का लाभ कैसे मिल रहा है? जैसे ही स्वर्ग का गेट आने वाला होता है,वह मूली को छोड़ देती है, वह भी वापस नरक में जा गिरती है और बाकी सब भी उसके साथ वही नर्क में जा पहुंचते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि स्वार्थ, लोभ और अहंकार से किया गया पुण्य कर्म भी हमें सद्गति में नहीं ले जा सकता।
-डॉ. कमलेश कली।
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