डॉ कमलेश कली
हम जब भी एक दूसरे से संबंध संपर्क में आते हैं, तो स्वाभाविक है कि हम एक-दूसरे से प्रभावित भी होते हैं और दूसरों पर भी प्रभाव डालते हैं। जब हम आपस में बातचीत करते हैं,लेन देन करते हैं, व्यवहार करते हैं,यह केवल स्थूल ही नहीं होता,हम आपस में ऊर्जा, भावनाओं और अहसासों का भी लेन देन करते हैं।आपस में अगर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है तो हमें दूसरे में अच्छाइयां दिखाई देती है,गुण दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि उसकी सकारात्मक ऊर्जा हमें सशक्त कर रही होती हैं, इसके विपरीत जब नेगेटिव ऊर्जा बहती है तो हमें अच्छा नहीं लगता, इससे फिर हमें दूसरे में भी अच्छाई दिखाई नहीं देती, उसमें अवगुण दिखाई देने लगते और फिर हम उनके बारे में नकारात्मक दृष्टिकोण बना लेते हैं। इसी के आधार पर फिर हम एक दूसरे के बारे में धारणाएं बना लेते, पूर्वाग्रह पाल लेते हैं कि फलां तो ऐसा हैं,वैसा है, फिर तो हम जैसे रंग का चश्मा पहन लेते हैं,उसी रंग के व्यक्ति दिखाई देने लग पड़ते हैं और उनके अमूर्त व्यक्तित्व में हम वहीं रंग भर उन्हें वैसे ही देखने लगते हैं। मतलब सब कुछ हम खुद ही बनाते हैं, किसी को खुदा तो किसी को शैतान बना देते हैं। तटस्थ होकर देखें तो सब कुछ हमारी अपनी रचना है, यह जो हम अपने मन के अंदर बना लेते हैं, फिर यह सारी सृष्टि जो बाहर दिखाई पड़ती है, उसी रचना की परछाई मात्र होती है। तभी तो कहते हैं, जिसकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। इसका अभिप्राय तो यह हुआ कि सब कुछ हमारे हाथ में है, मतलब हम जैसे मन में भावना करते हैं, दूसरे के लिए भाव रखते हैं, वैसे ही दूसरे प्रतीत होते हैं।एक बार एक कक्षा में दो मित्र आपस में एक टीचर के बारे में बात कर रहे होते हैं, उनमें से एक उसकी बहुत तारीफ कर कहता है कि वह बहुत अच्छी है, सत्यनिष्ठ है, सबसे प्रेम से बात करती है, उसे अपने विषय का भी बहुत अच्छा ज्ञान है आदि आदि, जबकि दूसरा उसके बारे में अच्छा नहीं सोचता होता और उसके बारे में नेगेटिव कमेंट्स देता है। दोनों आपस में विवाद करने लगते हैं,इस पर तीसरा विद्यार्थी बीच में आ जाता है और वह कहता है चलो, आज उसको जज कर लेते हैं। जब वो टीचर कक्षा में आती है तो उनमें से एक छात्र बेंच पर खड़ा हो कर टीचर से कहता है कि आज आप से कुछ पूछना है,हाथ में एक तितली लेकर उन्हें दिखाता है और पूछता है कि यह बताओं कि यह जीवित है, या मृत? अब टीचर जो है वो दुविधा में फंस जाती है और सोचने लगती है कि अगर वो कहती हैं कि यह जिंदा है तो, उसे ग़लत सिद्ध करने के लिए तितली को मार देगा, और अगर वो उसे मरा हुआ बताती है तो उस तितली को उड़ा कर की तितली तो जिंदा है, उसे झूठा सिद्ध कर देगा।पर टीचर ने बड़ी समझदारी से उत्तर दिया कि,” सब कुछ तुम्हारे हाथ में है, तितली जिंदा है या मरी हुई है!” सच है सब कुछ हमारे अपने ऊपर निर्भर करता है कि हम क्या सोच रहे हैं,कर रहे हैं तथा करने की मंशा रखते हैं। हमारा मन दर्पण की तरह है, वही उसमें दिखाई देता है जो हम इसके सामने रखते हैं,अब हमें यह निर्णय करना है कि इसमें हम क्या देखते हैं।
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